धर्म के नाम पर पशुबलि : संतोष शर्मा



धर्म के नाम पर पशुबलि 

संतोष शर्मा 
    आधुनिक सभ्यता के विकास की 21वीं     
 सदी में जब विज्ञान अपने चरमोत्कर्ष   
  पर है तब भी धर्म, आस्था ईश्वर के नाम पर कु-प्रथाएं आज भी चल रही हैं। विज्ञान एबं शिक्षा के प्रसार से जंहा अनेक कु-प्रथाएं हमारे मन-मस्तिष्क से मिटी हैं , वहीं कुछ प्रथाओं का अस्तित्व आज भी बना हुआ है। ऐसी ही एक भयंकर कु-प्रथा है पशुबलि। कालीपूजा, दुर्गापूजा, क़ुरबानी आदि उत्सवों में पश्चिम बंगाल आज भी पशुबलि जैसी कु-प्रथा से कलंकित हो रहा है। 
                   
                  धर्म, आस्था या ईश्वर, पूजा के नाम पर इस प्रथा में अनगिनत निरीह पशुओं की नृशंस रूप से बलि दी जाती है। जबकि धर्म के नाम पर किसी भी पशु की बलि चढ़ाना कानूनन जुर्म है। लेकिन धार्मिक आस्था को ठेंस नहीं पहुँचाने की आड़ में राज्य सरकर इस पशुबलि-प्रथा को बंद करने की ओर से उदासीन है। 
             
                "मुण्डमाला  तन्त्र में कहा गया है कि छागबलि देने से वक्तृता शक्ति, मेषबली देने से  कवित्व, महिषबली देने से धन-समृद्धि, मृगबलि देने से मोक्ष, पकशिबलि  देने से बैभव, गोधिकबलि  देने से श्रेष्ठ  फल ओर नरबलि देने से महासमृद्धि का लाभ मिलाता है।
           हे परमेश्वर ! राजा  ही नरबलि दे सकता ही; अन्य नहीं। व्राह्मण यदि सिंह-व्याघ्र और नरबलि  देता  है तो वह रौरव नरक में जाता है। अत: व्राह्मण को नरबलि देने का अधिकार नहीं है। चण्डाल की बलि देने से महासमृद्धि प्राप्त होती है।
           शुभ लक्षण वाले पशु को देवी के सम्मुख रखकर निम्नलिखित नियमों के अनुसार बलि देनी  चाहिये। यामल में लिखा है कि  बांये हाथ से सुलक्षण पशु को पकड़कर उस  पर तत्त्वमुद्रा से सात बार मूल मंत्रोच्चानणरपूर्वक  जल छिड़के ............बलि ..के बाद मांस के साथ रुधिर देवी को सर्पित करे।  (ब्रिह्त्तन्त्रसार ) " 

                                              
                       धर्म के नाम पर पहले  नरबलि दी जाती थी। किन्तु नरबलि  अवैध घोषित होने के बाद, खासकर नरबलि के लिए अपराधी को फंसी तक की सजा हो सकती है, यह संदेश पहुंच जाने के बाद नरबलि लगभग बंद हो गई है जबकि धर्म के नाम पर पशुबलि आज  भी कानूनों को ठेंगा दिखाती हुई चल रही हिन्। ज्ञात हो, किसी भी तरह की पशुबलि कानूनन जुर्म है। धार्मिक अनुष्ठान में पशु की बलि चदाना एक अमानविय  है। 

                    धर्म, आस्था, ईश्वर के नाम पर सबसे बड़ी कु-प्रथा का नाम है पशुबलि। अपने स्वार्थ-सिद्धि के मतलब से कुछ अन्धविश्वासी या  अंधी-आस्था में डूबे लोग आस्था या पूजा के नाम पर अबला पशुओं की नृशंस बलि चदा देते हैं।
                    

                    कालीपूजा, दुर्गापूजा, मंसौजा की तरह बकरीद में भी अनेक पशुओं की नृशंस बलि या क़ुरबानी दे दी जाती है। लेकिन धर्म, आस्था, पूजा के नाम पर चली आ  रही इस अवैध पशुबलि को रोकने में पुलिस व प्रशासन भी उदासीन नजर आती  है।
             
                द  प्रिवेंशन आफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट, 1960 के तहत धार्मिक अनुष्ठान में खुलेआम पशुबलि निषेध है। कोई भी प्रत्यक्षदर्शी उस बलि के खिलाफ पुलिस थाने में शिकयत दर्ज करवाता है तो उपासना-स्थल के उपासक सहित अनुष्ठान कमिटी के कार्यकर्ता  एवं बलि-प्रथा से जुड़े लोगों को गिरफ्तार कर क़ानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
              
                   वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत किसी भी धार्मिक-प्रथा के अनुसार प्राणी की हत्या करना दण्डनीय अपराध है। अपराध में जेल एवं 25 हजार रुपये तक जर्मने के प्रावधान है।
                         
                 आर्म्स एक्ट के तहत बिना लाइसेंस के अवैध एवं बलि केने के इस्तेमाल हथियातों  (खड्ग  अदि) उपासना स्थल पर रखना गैर-क़ानूनी एवं दण्डनीय अपराध है।
                    
                   पब्लिक न्यूसेंस एक्ट के तहत पशु की बलि किसी के सामने नहीं चढाई जा सकती है। एक श्रेणी के प्राणी की बलि उसी श्रेणी के अन्य  प्राणी के सामने नहीं चद़ा सकते है। उदाहरण, एक बकरे के सामने अन्य बकरे की बल नहीं चद़ा सकते।

            कर्नाटक, तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश, ओडिशा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश एवं झारखण्ड में पशु की बलि या कुर्बानी देना निषेध है। कोई भी प्रत्यक्षदर्शी इन प्रदेशों में किसी भी क्षेत्र में बलि या कुर्बानी होते देख उसके खिलाफ स्थानीय पुलिस ठाणे में प्रथिमिकी दर्ज करवा सकते ही।
                    
            लामिल्नादु सरकार द्वारा 'तमिलनाडु एनिमल्स एंड बर्ड सेक्रिफाइस  प्रिवेंसन एक्ट, 1950' को प्रयोग कर बलि या कुर्बानी को निषेध घोषित किया गया है।
              
             गुजरात सरकार द्वारा ' द गुजरात एनीमल प्रिजर्वेशन (अमेंडमेंट)एक्ट,2011' को लागू क्र प्रदेश में गो-हत्या  को सम्पूर्ण रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया है।



          वर्ष 2006 में कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश विकाश श्रीधर  शिरपुरकर  की खंडपीठ ने एक अत्यंत महत्यपूर्ण फैसले में आदेश दिया था कि खुलेआम पशुओं की बलि  नहीं दी जा सकती है क्यूंकि अधिकतर लोग और बच्चे बलि देखकर मानसिक रूप से आहत हो जाते हैं ..............

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